Gurukul | गुरुकुल

  गुरुकुल



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प्राचीन काल में हमारे देश भारत में गुरुकुल में बच्चे पढ़ा करते थे। वहाँ भी हर विषय कि पढ़ाई होती थी। शिक्षा जीवनशैली पर आधारित थी। वहाँ बच्चों का हर तरह से ,कह सकते है चहुतरफा - शारीरिक , मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता था। उस वक़्त बच्चे पाँच वर्ष की उम्र में ही गुरुकुल जाते थे। उन्हें उसी उम्र से अपने सारे काम स्वयं  करने होते थे। सारे शिष्टाचार सीखा  दिये  जाते थे। ज्यादातर शिक्षा प्रायोगिक हुआ करती थी  ,इसकारण बच्चे गुरुकुल में बहुत  मन लगाकर अध्ययन करते थे । साथ ही उन्हें अपने पसंद के विषय चुनने में भी आसानी होती थी।बच्चे को अपने पसंद की शिक्षा पूरी करने की छूट थी।उनकी  परीक्षा  हर प्रकार से हुआ करती थी । जो बच्चा जिस लायक होता था उस विषय में वो अपने आप को निपुण बनाता था ।ऐसा कभी नहीं होता कि सारे बच्चे एक सामान बुद्धि वाले हों , हाँ पर इसतरह के विद्या अर्जन में बच्चे स्वाबलंबी और संस्कारी जरूर बन जाते थे। उनके माँ बाप को आज के माँ-बाप की तरह पीछे-पीछे चलना नहीं पड़ता था।कितने वीर ,पराक्रमी और विदुषी हुआ करते थे हमारे यहाँ के लोग। गुरुकुल धीरे-धीरे समाप्त हो गया।इसमें भी अंग्रेजो का ही हाथ था।बहरी देश के लोग जब भ्रमन करते हमारे देश आते थे तो यहाँ के लोगो में धार्मिक, आध्यातमिक संस्कृति  को देख कर आश्चर्यचकित रह जाते थे ।तब उनके शैतान दिमाग में आया की अगर इस देश पर राज करना है तो यहाँ इनके धार्मिक संस्कृति में ही सबसे पहले फुट डालनी होगी । वही किया और हमारे यहाँ के के लोगो में धीरे- धीरे फुट डालना शुरू किया।वैसे भी हमारे यहाँ के लोग बाहरीआडम्बर और दिखावे के पीछे ही ज्यादा भागते नजरआते है।आग लगाने के लिए बस  माचिस की तिल्ली ही काफ़ी होती है । अंग्रेज़ो ने जो चाहा किया यहाँ की  संस्कृति को तहस नहस कर दिया।अंग्रेजो ने हमारी शिक्षा पद्धति का सर्वनाश कर अपनी नींव इतनी मजबूत कर गए की वो आज तक अपनी जगह से नहीं हटाया गया।बल्कि अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चे को लोग ज्यादा सम्मान करते थे।शिक्षा आज के दिखावे वाली अंग्रेजी शिक्षा में परिवर्तित हो गई ।जिसमे बच्चों को अंग्रेजी तो फर्राटेदार बोलनी आती है पर अंदर से खोखले ही होते है। बच्चे हर काम के लिए दुसरो पर आश्रित होते है। इसमें गलती शायद हम माँ-बाप की  भी  है।हम भारतीयों की सबसे गंदी आदत ये है की हम अपने अंदर की अच्छाइयों को छोड़ कर बाहरी दिखावे के चक्कर में बुराइयों को अपना कर अत्याधुनिक  बनने की होड़ में लग जाते है ।उसी का परिणाम है ये आधुनिक शिक्षा।हमारे यहाँ के ज्ञान- संस्कार, ग्रन्थ , रीतिरिवाज आज भी दूसरे देशों में शोध का विषय है।अगर कोई अपनी विवेक का विस्तार कर के सोचे तो पता चलेगा की हम जिन्हें ईश्वर मानते है -हमारे भोले बाबा ,भगवान गणपति के सिर की सर्जरी कर चुके है।ऐसा नहीं है कि मेडिकल साइंस बाहरी देशों से आया हैं।ये तो हमारे देश में पुरातन काल से चली आ रही है । यहाँ का आयुर्वेद को तो आज भी पूरी दुनिया ने अपनाया है और शोध का विषय बना हुआ है।हमारे देश से अंग्रेजो को तो कुछ वीर पुरुषो की  कुर्बानी की वजह से भगाया जा सका,पर आज भी लोग अंग्रेजी  संस्कार और भाषा कर गर्व अनुभव करते।

चलिए भाषा तो फिर भी ठीक है जाननी चाहिए, पर हम किसी के गंदे संस्कार को अपना कर क्या साबित करना चाहते है ? अब जो खो दियाउसपर पछताने से कोई फायदा नहीं और दुसरो को दोष देकर भी फायदा  नहीं है । तो क्यों न हम आज से ही अपने बच्चों को स्वावलंबी बनायें । उन्हें घर में ही बचपन से ही  सारा काम करना सिखाते जाये और करवाते जाये।उन्हें हर वक़्त,हर दिन कुछ न कुछ सिखाये,अच्छे संस्कार दे।उन्हें हर वक़्त ये कहे की वो ये सब कर सकते है।उनमे हमेशा सकारात्मक विचार डाले।ये बचपन में डाली हर आदत आगे चल कर उन्हें कष्ट नहीं होने देगी । और आप अपने बच्चो को आत्मविस्वास से भर देंगे।बस इतनी सी मेहनत से आप अपने बच्चो को आत्मनिर्भर बना देगे ।बच्चों का पूरा जीवन  सँवर जायेगा। खुश भी रहेंगे।ऐसे बच्चे ही एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकते है ।  बच्चे तो गिली मिटटी होते है उन्हें ढलान हमारी ही जिम्मेदारी है । फिर हम अपने आसपास के समाज को दोष नहीं देगे ।अच्छे समाज के विकास में सहयोग  करना हमारा सबसे पहला कर्तव्य है ।आज कल लोग बहुत ज्यादा जापान की शिक्षा नीति पर वहाँ के रहन सहन पर बातें करते रहते है । पता है क्यों जापान ने अपने संस्कार को संभाल कर रखा है ? क्योंकि उसने बाहरी देशों के संस्कार की हवा अपने देश में घुसने ही नहीं दिया । हमारे यहाँ तो ये हवा भी हमारे यहाँ के महान नेताओं की भी देन है।हर जगह अच्छे और गंदे लोग होते है । सोचना तो ये है  हमें किस ओर बढ़ना है ।हमें अपने बच्चो को सूखे पत्ते की तरह नहीं बड़ा करना है जो हवा आते ही उड़ जाये । उन्हें हमें ह्रदय से मजबूत बनाना है ।तो आइए हम सब मिलकर फिर से एक नए सिरे से गुरुकुल की स्थापना की शुरुआत आज से ही करे। एक सुन्दर समाज  के  गठन  कि नींव डाले । एक सुन्दर सुरुआत करे ।




     

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