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श्री गुरु पादुका स्तोत्रम्, Namoh Namah Sri Guru Padukabhyam

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 ॥ श्री गुरु पादुका स्तोत्रम् ॥ अनंत-संसार समुद्र-तार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्याम् । वैराग्य साम्राज्यद पूजनाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥1॥ कवित्व वाराशिनिशाकराभ्यां दौर्भाग्यदावांबुदमालिकाभ्याम् । दूरिकृतानम्र विपत्ततिभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥2॥ नता ययोः श्रीपतितां समीयुः कदाचिद-प्याशु दरिद्रवर्याः । मूकाश्च वाचस्पतितां हि ताभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥3॥ नालीकनीकाश पदाहृताभ्यां नानाविमोहादि-निवारिकाभ्यां । नमज्जनाभीष्टततिप्रदाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥4॥ नृपालि मौलिव्रजरत्नकांति सरिद्विराजत् झषकन्यकाभ्यां । नृपत्वदाभ्यां नतलोक पंक्ते: नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥5॥ पापांधकारार्क परंपराभ्यां तापत्रयाहींद्र खगेश्र्वराभ्यां । जाड्याब्धि संशोषण वाडवाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥6॥ शमादिषट्क प्रदवैभवाभ्यां समाधिदान व्रतदीक्षिताभ्यां । रमाधवांध्रिस्थिरभक्तिदाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥7॥ स्वार्चापराणां अखिलेष्टदाभ्यां स्वाहासहायाक्षधुरंधराभ्यां । स्वांताच्छभावप्रदपूजनाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥8॥ Maithili Bhagwati geet...

Bhagwati geet | मैथिली भगवती गीत | Maithili Bhagwati geet| Durga geet | दुर्गा गीत

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Bhagwati geet  मैथिली भगवती गीत  Maithili Bhagwati geet  Durga geet  दुर्गा गीत  त्रिपुर सुंदरी माँ    दियो भक्ति के दान हे अम्बे,हमें जइबे कता जगदम्बे |   दियो भक्ति के दान हे अम्बे,हमें जइबे कता जगदम्बे ||   जेकर पुत्र परम अज्ञानी,ओकर माता छै अम्बे भवानी |  जेकर पुत्र परम अज्ञानी,ओकर माता छै अम्बे भवानी |  दियो दियो सहारा हे अम्बे,हमें जैबे कता जगदम्बे || दियो दियो  सहारा हे अम्बे,हमें जैबे कता जगदम्बे ||  दियो भक्ति के दान हे अम्बे,हमें जइबे कता जगदम्बे |   दियो भक्ति के दान हे अम्बे,हमें जइबे कता जगदम्बे | पुत्र गलती अनेको करइ  छै,ओकर माता नै मन में धरै छै |  पुत्र गलती अनेको करइ छै,ओकर माता नै मन में धरै छै |   दियो दियो सहारा हे अम्बे,हमें जैबे कता जगदम्बे | दियो दियो सहारा हे अम्बे,हमें जैबे कता जगदम्बे ||  हमर नैया परल मझधार में,हमरा शक्ति नय छै कमर में| हमर नैया परल मझधार में,हमरा शक्ति नय छै कमर में| दियो दियो सहारा हे अम्बे,हमें जैबे कता जगदम्बे | दियो दियो ...

सीखो कविता --- कवि श्री नाथ सिंह

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  सीखो कविता  कवि श्री नाथ सिंह  फूलों से नित हँसना सीखो, भौंरों से नित गाना। तरु की झुकी डालियों से नित, सीखो शीश झुकाना! सीख हवा के झोकों से लो,  कोमल भाव बहाना ! दूध और पानी से सीखो, मिलना और मिलाना! सूरज की किरणों से सीखो, जगना और जगाना! लता और पेड़ों से सीखो, सबको गले लगाना! वर्षा की बूँदों से सीखो, सबसे प्रेम बढ़ाना! मेहँदी से सीखो सब ही पर, अपना रंग चढ़ाना!   दीपक से सीखो, जितना हो सके अँधेरा हरना! पृथ्वी से सीखो प्राणी की सच्ची सेवा करना! मछली से सीखो स्वदेश के लिए तड़पकर मरना! पतझड़ के पेड़ों से सीखो, दुख में धीरज धरना! जलधारा से सीखो, आगे जीवन पथ पर बढ़ना! और धुएँ से सीखो हरदम ऊँचे ही पर चढ़ना! श्री नाथ सिंह   

सब के सुधि अहा लै छी हे अम्बे, हमरा किये बिसरै छी हे, Bhagwati geet, मैथिली भगवती गीत,

सब के सुधि अहा लै छी हे अम्बे, हमरा किये बिसरै छी हे Bhagwati geet मैथिली भगवती गीत सब के सुधि अहा लै छी हे अम्बे, हमरा किये बिसरै छी हे ---२  हमरा किये बिसरै छी हे अम्बे, हमरा किये बिसरै छी हे  हमरा दिश से  मुँह फेरै छी, यी नै उचित करइ छी हे |  सब के सुधि अहा लै छी हे, अम्बे हमरा किये बिसरै छी हे ---२  हमरा किये बिसरै छी हे, हमरा किये बिसरै छी हे सब के सुधि अहा लै छी हे, अम्बे हमरा किये बिसरै छी हे ---२  हे जगदम्बा, जग अवलम्बा तारिणी तरिणी बनयी छी हे -- ४ क्षण क्षण पल पल ध्यान धरै छी -- २  दरसन बिनु तरसै छी हे -- २  सब के सुधि अहा लै छी हे अम्बे, हमरा किये बिसरै छी हे ---२  छी हम पुत्र अहइ के जननी, से तो अहा जनै छी हे -- ४ रात दिन हम विनय करइ छी, पापी जान खेलै छी हे | सब के सुधि अहा लै छी हे अम्बे, हमरा किये बिसरै छी हे ---२  हमरा किये बिसरै छी हे अम्बे, हमरा किये बिसरै छी हे - २  सब के सुधि अहा लै छी हे अम्बे, हमरा किये बिसरै छी हे ---२ हमरा दिश से मुँह फेरै छी, यी नै उचित करइ छी हे |  सब के सुधि अहा लै छी हे अम्बे, हमरा किये...

श्यामल वरन मृगलोचन भवानी के डेरा कता छन हे, Bhagwati geet, मैथिली भगवती गीत,

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श्यामल वरन मृगलोचन भवानी के डेरा कता छन हे      Bhagwati geet मैथिली भगवती गीत श्यामल वरन मृगलोचन भवानी के डेरा कता छन हे ... 4 डेरा कता छन   ... 4 श्यामल वरन मृगलोचन भवानी के डेरा कता छन हे ... 2 माँ के दुआरी पर अड़हुल के गछिया .. २ गम गम गम गम गमके भवानी के डेरा कता  छन हे .... 2  श्यामल वरन मृगलोचन भवानी के डेरा कता छन हे ... २ माँ के दुआरी पर नीम के गछिया ..  २ लह लह लह लह लहके भवानी के डेरा कता छन हे  श्यामल वरन मृगलोचन भवानी के डेरा कता छन हे ... 2'  माँ के दुआरी पर धुप दिप जलइउ --- २ गम गम गम गम गमकै भवानी के डेरा कता  छन हे -- २  श्यामल वरन मृगलोचन भवानी के डेरा कता छन हे ... 4   Ramraksha stotram

Sri Hanuman Chalisa, श्री हनुमान चालीसा

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   श्री हनुमान चालीसा   Sri Hanuman Chalisa दोहा  श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि | बरनऊं रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि || बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन कुमार | बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार || चौपाई  जय हनुमान ज्ञान गुन सागर | जय कपीस तिहुं लोक उजागर || रामदूत अतुलित बल धामा | अंजनि पुत्र पवनसुत नामा || महाबीर बिक्रम बजरंगी |  कुमति निवार सुमति के संगी || कंचन बरन बिराज सुबेसा | कानन कुंडल कुंचित केसा || हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै | कांधे मूंज जनेऊ साजै || संकर सुवन केसरीनंदन | तेज प्रताप महा जग बन्दन || विद्यावान गुनी अति चातुर | राम काज करिबे को आतुर || प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया |  राम लखन सीता मन बसिया || सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा | बिकट रूप धरि लंक जरावा || भीम रूप धरि असुर संहारे | रामचंद्र के काज संवारे || लाय सजीवन लखन जियाये | श्रीरघुबीर हरषि उर लाये || रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई | तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई || सहस बदन तुम्हरो जस गावैं | अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं || सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा | नारद सारद सहित अहीसा ...

अर्गलास्तोत्रम्, Argala Stotram - In sanskrit

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  Argala Stotram अर्गलास्तोत्रम्  अर्गलास्तोत्रम् -   ॐ  जयन्ती मङ्गला काली Argala Stotram - Om Jayanti Mangala Kali ॐ अस्य श्रीअर्गलस्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषि: अनुष्टुप् छन्द, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गात्वेन जापे विनियोगः || ॐ नमः चण्डिकायै ||  मार्कण्डेय उवाच  ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली  कपालिनी |   दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते  ||  १  || Om Jayanti Mangala Kali Bhadrakali Kapalini| Durga  Kshmaa   Shiva Dhaatri Swahaa Svadha Namostu Te || 1|| जय त्वम् देवी चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि | जय सर्वगते देवी कालरात्रि नमोस्तुते || 2  || Jai Tvam Devi Chamunde Jai Bhutartihaarini | Jai Sarwgate Devi Kaalaraatri Namostu Te ||2||   मधुकैटभ विद्राविविधातृवरदे  नमः |    रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||३|| Madhu-Kaitabh-विड्रा Vividhaa Trivarde Namah | Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dviso Jahi ||3|| महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां  सुखदे नमः...

वीरों का कैसा हो वसंत? सुभद्राकुमारी चौहान

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वीरों का कैसा हो वसंत सुभद्राकुमारी चौहान  सुभद्राकुमारी चौहान वीरों का कैसा हो वसंत? आ रही हिमाचल से पुकार, है उदधि गरजता बार-बार, प्राची, पश्चिम, भू, नभ अपार, सब पूछ रहे हैं दिग्-दिगंत, वीरों का कैसा हो वसंत? फूली सरसों ने दिया रंग, मधु लेकर आ पहुँचा अनंग, वधु-वसुधा पुलकित अंग-अंग, हैं वीर वेश में किंतु कंत, वीरों का कैसा हो वसंत? भर रही कोकिला इधर तान, मारू बाजे पर उधर गान, है रंग और रण का विधान, मिलने आये हैं आदि-अंत, वीरों का कैसा हो वसंत? गलबाँहें हों, या हो कृपाण, चल-चितवन हो, या धनुष-बाण, हो रस-विलास या दलित-त्राण, अब यही समस्या है दुरंत, वीरों का कैसा हो वसंत? कह दे अतीत अब मौन त्याग, लंके, तुझमें क्यों लगी आग? ऐ कुरुक्षेत्र! अब जाग, जाग, बतला अपने अनुभव अनंत, वीरों का कैसा हो वसंत? हल्दी-घाटी के शिला-खंड, ऐ दुर्ग! सिंह-गढ़ के प्रचंड, राणा-ताना का कर घमंड, दो जगा आज स्मृतियाँ ज्वलंत, वीरों का कैसा हो वसंत? भूषण अथवा कवि चंद नहीं, बिजली भर दे वह छंद नहीं, है क़लम बँधी, स्वच्छंद नहीं, फिर हमें बतावे कौन? हंत! वीरों का कैसा हो वसंत?

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के, शिवमंगल सिंह सुमन

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   हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के   कवि :-  शिवमंगल सिंह सुमन  हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे।  शिवमंगल सिंह सुमन  हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्‍वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले, बस सपनों में देख रहे हैं तरु की फुनगी पर के झूले। ऐसे थे अरमान कि उड़ते नील नभ की सीमा पाने, लाल किरण-सी चोंचखोल चुगते तारक-अनार के दाने। होती सीमाहीन क्षितिज से इन पंखों की होड़ा-होड़ी, या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती साँसों की डोरी। नीड़ न दो, चाहे टहनी का आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो, लेकिन पंख दिए हैं, तो आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालो।