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सीखो कविता --- कवि श्री नाथ सिंह

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  सीखो कविता  कवि श्री नाथ सिंह  फूलों से नित हँसना सीखो, भौंरों से नित गाना। तरु की झुकी डालियों से नित, सीखो शीश झुकाना! सीख हवा के झोकों से लो,  कोमल भाव बहाना ! दूध और पानी से सीखो, मिलना और मिलाना! सूरज की किरणों से सीखो, जगना और जगाना! लता और पेड़ों से सीखो, सबको गले लगाना! वर्षा की बूँदों से सीखो, सबसे प्रेम बढ़ाना! मेहँदी से सीखो सब ही पर, अपना रंग चढ़ाना!   दीपक से सीखो, जितना हो सके अँधेरा हरना! पृथ्वी से सीखो प्राणी की सच्ची सेवा करना! मछली से सीखो स्वदेश के लिए तड़पकर मरना! पतझड़ के पेड़ों से सीखो, दुख में धीरज धरना! जलधारा से सीखो, आगे जीवन पथ पर बढ़ना! और धुएँ से सीखो हरदम ऊँचे ही पर चढ़ना! श्री नाथ सिंह